नाम - मनीश कुमार सेमवाल
स्थायी पता - गाँव - पसालत पोस्ट - लमगौंदी जिल्ला - रूद्रप्रयाग उत्तराखंड
पत्र ब्यवहार - 1503 बौगंविल टॉवर, केमयोरण अपार्टमेन्ट , जकार्ता, इंडोनेशिया
ब्यवसाय - अध्यापन (बर्तमान मैं जकार्ता, इंडोनेसिया मै कार्यरत)
शिक्षा - ऍम ए. /डॉक्टरेट उपाधि (भूगोल)
(ALL POEMS ARE SUBJECTED TO COPY RIGHT)

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जब फिजां बदली होगी
अब तो मौसम ने करवट बदल दी होगी
भूरी धरती पर हरी चादर बिछ गयी होगी
रंग उकेरे होंगे फूलो ने
खगों के कलरव ने फिजा बदल दी होगी.

पहाड़ो पर बिछी बर्फ पिघलने लगी होगी
समवेत सुरों में नदिया बड़ियों मई गूंजने लगी होंगी
इन्द्रधनुष जुड़ गया होगा आसमां से
झरनों की तालो ने फिजा बदल दी होगी .

सरसों की पीतिका से तितर ने ताल सुनाई होगी
खिली कपोलो पर तितली डगमगाई होगी
नयी साखों पर बन गए होंगे हजारों घोसले
नवागंतुकों के शोर ने फिजा बदल दो होगी

फाल्गुन के मल्हार में फूलों ने कविता गयी होगी
बसंती चोला ओढ़े जब धरती नाची होगी
माँ तुने दूंदा होगा तब मुझको
फिर हिचकी से अपनी, अपनेआप समझ गयी होगी.

मनीश सेमवाल





मैं घर आवूंगा
पाऊँगा आशीष माँ के चरदों का
तुलसी को, कुलदेवी को नमन करूंगा
चिल्लावूँगा पहाड़ो के परे
अब मैं जल्दी घर आवूंगा
कान्हा बनूँगा गायों के संग
बच्चो के संग पेड़ चादूंगा
झुमुंगा तरुओं के संग
अब मैं जल्दी घर आवूंगा
मैं बनचर बन वन वन फिरूंगा
केलि मैं खगों संग मस्त रहूँगा
फसलों सा लहराऊंगा खेतों मैं
अब मैं जल्दी घर आवूंगा
तब मेरा ठौर ठिकाना न होगा
जब मैं त्योहारों मैं व्यस्त रहूँगा
होली दीवाली ईद दशहरा संग मनावुंगा
अब मैं जल्दी घर आवूंगा

मनीश सेमवाल

गड़ देश मे मेरे आतंकी साया
हिमालय से निकला लहू बनके पानी

न सरकार जागी न सरोकार कोई
जनता भटकती रही मारी- मारी
छड़ मे हज़ारो के जीवन को लीला
नये कोपालो की निशानी मिटाकर

गड़ देश मे मेरे आतंकी साया
हिमालय से निकला लहू बनके पानी.

पल मे बुझे है हज़ारो के दीपक
आशा, निराशा मे बदली है करवट
बनी ज्ञान गंगा नई मृत्यूशया,
हज़ारो चिरागो की निशानी चुराकर

गड़ देश मे मेरे आतंकी साया
हिमालय से निकला लहू बनके पानी

सभ्यता की जननी मे पसरी सूनामी
रिवाजो के सूचक की मिटी है निशानी
बिरासत ये बरसो की ज़मींदोज़ करके
बनी आशा उदगम, निराशा की सूचक

गड़ देश मे मेरे आतंकी साया
हिमालय से निकला लहू बनके पानी.

बांधो ने रोका, सुरंगो से निकला
सुने पड़े खाली ढालो से उतरा
उदन्दता की सारी हदो को गिराकर
वो खेतो से गुजरा, मकानो को लेकर ...

गड़ देश मे मेरे आतंकी साया
हिमालय से निकला लहू बनके पानी.........
.......................................
डा. मनीश सेमवाल
( After Uttrakhand Calamity) From Jakarta Indonesia





माँ हैं

माँ हैं रस की छंद पहेली
माँ दादी की पुडिया सी
माँ आगन की तुलसी है
माँ फूलों की क्यारी सी
माँ है मन का निश्छल प्रेम
माँ उपवन के माली सी
माँ बरसों की बिरासत है
माँ ख्याबों की मंजिल सी
माँ है सब तीर्थों का रस
माँ बचपन की कहानी सी
माँ है अपना पुस्तक ज्ञान
माँ व्यास की गीता सी
माँ तू है जन्मो का बंधन
माँ खुशियों की कुंजी सी
माँ बिन सुना है सब कुछ
माँ ही अपनी दुनिया सी

मनीश सेमवाल

माँ
हम सब को आजाद किया
फिर पंख दिए तब उड़ने को
बेफिक्र उड़े हम पार सरहदों के
घर मैं है उजियारी माँ

दर्द हमारा बटती रहती
अब भी सिख सिखाती है
अपने दर्दों को तो माँ
फूँक से चूल्हे मैं जलाती है

शेखी है हमको हरे भरे खेतों की
दूर पहाड़ों के उस मौसम की
अहसास कहा हम कर पाते है
टंड से अल्झायी तेरी उँगलियों की
मनीश सेमवाल



श्रृंखला

जिस भी शहर मैं कदम भटकते है
दो चार साथ हो जाते है
क्या कहू की वोह भटके हुए है
जो मेरे साथ साथ चले आते है
कोई नहीं जागृत करता इनको
खुद ही हाथ बढाये जाते है
शायद ये उत्पीडन से जकड़े हुए है
जो सडको पर उतर आते है
बिरोध पर उतारू अंजाम से दूर
दम नहीं है पर दम लगाकर चिलाते है
निहत्थे मौत के सामने
हाथ उठाए सीना ताने चले आते है
उतर आता है बारूद , पार हो जाता है
सरेआम सडको पर लांशों का देर जम जाते है
कोई आये कफ़न डाले या खूब रोले
या फिर लाश मैं आदमी साद जाते है
इसी भीड़ का एक पथिक हूँ
लोग समुदाय को बड़ा जाते है
दीखते है असहाय उपेक्षित कुछ लोग
जो स्वर मै स्वर मिलाये जाते है
मनीश सेमवाल


सब कहे

मै गाता हूँ लिखता हूँ तुम्हारे लिए
मेरे प्यारे वतन बस तुम्हारे लिए
दिल मै अरमान आखों मैं सपने लिए
मैं रातों को जगता हूँ तुम्हारे लिए
लोग और भावनाए मेरे देश की
शांति सुशान्ति मेरे देश
मै पिरोता हूँ सपने वतन के लिए
ऐ बतन प्यार दिल मैं है तुम्हारे लिए
बीरता बिर्गाथा मेरे देश की
शूरता और परम्परा मेरे देश की
सरे बलिदान अपने ही मन मै लिए
लाखों नमन है तुम्हारे लिए
मेरे प्यारे वतन मेरे उजले चमन
मेरा जीना और मरना तुम्हारे लिए
मोक्ष का द्वार कर है कही पर अगर
न्योछावर है वोह द्वार तुम्हारे लिए

मेरे प्यारे वतन बस तुम्हारे लिए
मनीश सेमवाल


माँ

जब भी पड़ोस की बुवा और वोह कुत्ता मेरा
अचक से घर के दरवाजे पर आते होंगे
मेरी माँ के दिल मैं एक धड़कन
फिर सोचती होगी की मेरे बच्चे आये होंगे
इन जड़ो की ठंडी दुपहरों में
गुमसुम छत पे गेहू सुखाती हुई
जब घर से सटे पेड़ से अनार गिर के आयेंगे ,
माँ सोचेगी की मेरे बछो ने गिराए होंगे
उठ कर देखेगी तब कही ,
फिर मन मसोड़ कर बैठ जायेगी
तभी छुट्टी होगी स्कुल क बच्चो की
चाय का प्याला हाथ मैं लिए आती होगी
कभी चुपचाप गाय की गोशाला मैं
पूरा दूध जमीं पर काड़ देती होगी
फिर गाय को सहाल कर
खाली बर्तन लिए घर चली आती होगी
गुनगुनाते हुए रात मैं खाना बनाते समय
कई बार अंगीठी मैं हाथः जलाती होगी
युही रात को हमारे बिस्तेर पर देखकर
चुपचाप रजाई उडाकर सोचती होगी की मेरे बच्चे सोये होंगे.
की मेरे बच्चे सोये होंगे……………………..
डा. मनीश सेमवाल दिनाक २३ सितम्बर १९९७ आगरा



माँ

माँ है रस की छंद पहेली,
माँ दादी की पुडिया सी
माँ आँगन की तुलसी हैं
माँ फूलों की क्यारी सी
माँ है मन का निश्छल प्रेम
माँ उपवन के माली सी
माँ बरसो की विरासत है
माँ ख्वाबो की मंजिल सी

माँ है सब तीर्थो का रस
माँ बचपन की कहानी सी
माँ है अपना पुस्तक ज्ञान
माँ व्यास की गीता सी
माँ तू है जन्मो का बंधन
माँ खुशियों की कुंजी सी
माँ बिन सुना है सब कुछ
माँ ही अपनी दुनिया सी


डा. मनीश सेमवाल --- दिनांक १६, मई , 2005 हगाज़, एरिट्रिया , अफ्रीका



(गड्वाली गीत)
गों म्येरू बद्लिग्ये

कख भटयोद मैन, के माँ ब्योन अब मैन
बद्लिग्ये बद्लिग्ये हाँ गो म्येरू बद्लिग्ये.....

पचीस मवास्यु कु योक गों च म्येरू लोगो,
पचीस चीन अब धारा, जख योक छो बस धारो,
योक घोरो कु बिंदरू गाँव भर मा बतयन्दु छो ,
अब लागोंदा बना की सदया नि बुत्यु छो

बद्लिग्ये बद्लिग्ये हाँ गो म्येरू बद्लिग्ये....

औंदा च मथ्या ख्योल्या, जब हौंडा छा त्यौहार .
कांधा मा हाथ धोरीक लागोंदा छा झुमेलो
अब घरु- घरु चन ख्योल्या, मथख्योल्या घास जम्यु छा
केन जगोड भैलो घरु- घरु आग लग्यु चा

बद्लिग्ये बद्लिग्ये हाँ गो म्येरू बद्लिग्ये....

गाँव का सिध्व देवता की पूछ नि अब जाच
मांगी का सतनाजू नर्सिंग मु जाडा चन ,
जवान चीन मन यख जख बुद्य नि मरद छा
कण नि उगड़ स्यारू अब घाट लाडा चन .....

... ... बद्लिग्ये बद्लिग्ये हाँ गो म्येरू बद्लिग्ये....

पिडू परात गो माँ सब टप्प पड्यु चा
भे मनो ते थमलु एक भे ल्यू खडू चा
पता भी नि चलद कब हवे छो स्यो बीमार
कांधा लगोड़ कैन मुर्दा ख्योला ढ्वोल्यु चा

बद्लिग्ये बद्लिग्ये हाँ गो म्येरू बद्लिग्ये......

बचपन भी ह्वेग्ये कुछ यनि मिलीजुली का नि रोंदा.
बवे-बबुन त्योका भी कनद्युद भार्या रोंदा..
नि करदा कख्दी चोरी इस्कूल नि जांदा कठा
कख गेन फूलरी अब केन नाचोड़ घ्वोगा

बद्लिग्ये बद्लिग्ये हाँ गो म्येरू बद्लिग्ये......

कई नोना की बहर बे जब चिठ्ठी क्वे औंदी छे
आशु की बरखा माँ पठाल रददी छे
गेन कख क्वाजनी सी बीर दीदा -भूली
स्वारा से आई मैत अब पच्यन्दि नि भूली

बद्लिग्ये बद्लिग्ये हाँ गो म्येरू बद्लिग्ये......

औंदो छो जब रिसुल्ट हौंडा चा नोना पास
आर्सो का त्योल्ये की गो माँ औंदी छे बास
अब केन बड़ोद अरसा, गुलगुला ते गुडेनी
अब नोनु क्वे जन्दु भेर कनफूसी होई चा .....

बद्लिग्ये बद्लिग्ये हाँ गो म्येरू बद्लिग्ये.......

गुड टिल बत्यंदा चा गो भर माँ तब लोगोजब नया बल्दो की होंदी छे स्वीजोत
बया भेसो कु कभी प्योस बत्यांदु छो
अब भेस कु लोगो अड्कुलू ढक्यु रोंदू

बद्लिग्ये बद्लिग्ये हाँ गो म्येरू बद्लिग्ये....

कन बदली गो म्येरू कण पड़ी या दरार
कन ल्योड वापस म्येरू गो योक परिवार
ह्वेजा पैली जब तुम यां बिनिती छो तुम सबसे
यां दिवाली खयान की म्येरी आस छो ये कब से

बद्लिग्ये बद्लिग्ये हाँ गो म्येरू बद्लिग्ये....

न करा मुड कपल न घात लगा मन पे
बांटा बिंदरू फिर तुम सजा ते धारा फिर से
अब दोवाली मा तुम अयान मथ्या ख्योला
अबकी भूलो मैन फिर भेलो सजयु चा.


बद्लिग्ये बद्लिग्ये हाँ गो म्येरू बद्लिग्ये....
कख भटयोद मैन, के माँ ब्योन अब मैन
बद्लिग्ये बद्लिग्ये हाँ गो म्येरू बद्लिग्ये.....
( डॉ. मनीश सेमवाल)




..ब्वे याद औंदी या बात...


सात समुन्द्र पार याद औंदी यह बात

त्येरी मुखडी त्येरी अन्द्वार त्येरा जिकुडा की बात

वाख्ला कु सट्टी और क्वाटार कु नाज

धौ लगोड़ दिन माँ बवे घौर औ दये भात

अब सात समुन्दर पर याद औंदी या बात .

..ब्वे याद औंदी या बात...
त्येरी शांकी, त्येरी भुक्की, त्येरा अंग्वाल की याद

सागवाडा कु पंग्गु और प्वान्गादा कु नट्टू

प्वान्गरियु की माल्यार माँ ब्वे बरखा कु गिगारात

अब सात समुन्दर पर याद औंदी या बात .

..ब्वे याद औंदी या बात...
त्येरी क्योखी, त्येरी वाणी, त्येरा दूध की याद

ग्वाथ्यरा कु ग्वोरू और डाल्यु कु न्यार

ग्यु बुतन माँ प्वान्ग्दा और हलियु कु रागारयत

अब सात समुन्दर पर याद औंदी या बात .

..ब्वे याद औंदी या बात...
त्येरी ख्वोली,त्येरा सागवाडा त्येरा पन्द्यारा की याद

भे-बड़ो की खिज्योद और बुखड़ो की बात

गो मूलक का दगादिया और त्येरी बुलाक की याद

अब सात समुन्दर पर याद औंदी या बात .

..ब्वे याद औंदी या बात...
http://www.youtube.com/watch?v=Na4TleHGU5o
( डॉ. मनीश सेमवाल )


जब याद औंदो मिथे उत्तराखंड.

तौं चौमासों तौं डांडी काठियों, तौं गाड़ गदरोँ की याद औंदी
मन माँ बटीं म्येरा आंसू छुट्दा, जब याद औंदो मिथे उत्तराखंड.
उत्तराखंड, उत्तराखंडी म्येरो उत्तराखंड.....

तौं बाणो माँ ग्वेरु दगडी, काफल का डाल्यो मा,
काखड़ी च्योरी दगडियुं दगडी, इस्कुलो का बाटो मा
गाड़ी पथेर ज्वोड ल्ग्या छन, घौर उंडा का बाटो मा
स्यी मुंगरी, स्यी माल्टा और भात माँ का हाथ कु .......
याद औंदो.......याद औंदो मिथे उत्तराखंड.

मरच की बीजवाड़ क्यारी , भै-बाणो मा पाणी की बारी
अपणा घौर प्वांगड़ा बांजा, घौर अग्वाड़ी आरु की डाल्यी
गो भर मा ल्योड़ा पथरी , गुल्ली -डंडा और छक शैतानी
स्यी दगडिया, स्वो दगडो, और गाल्यी माँ का घीचे की
याद औंदी ................याद औंदो मिथे उत्तराखंड.

माँ कु प्यार यख नी मिलद, दगडीयू मा स्य बात कख च
भै-बाणो और गो की प्यार और दादी कु स्वो दुलार
याद औंदो................याद औंदो मिथे उत्तराखंड.

तौं चौमासों तौं डांडी काठियों, तौं गाड़ गदरोँ की याद औंदी
मन माँ बटीं म्येरा आंसू छुट्दा, जब याद औंदो मिथे उत्तराखंड.
उत्तराखंड, उत्तराखंडी म्येरो उत्तराखंड.....
( डॉ. मनीश सेमवाल )
https://www.youtube.com/watch?v=tZLMoNj5wAg

I am a girl from the Himalaya...


I am a girl of the Himalayas
Miles Away at the shores of Jakarta
Growing with Gandhian Values and pancasila
I am a girl from the Himalayas.

Cultural bounds, heritage of folks,
Spreading arms towards the future,
Parents' shoulders, teachers' wisdoms,
will make me walk through the knowledge garden.

Sweet little sister, naughty folks
Pushing me up towards the zenith.
Destiny unknown, to be a mighty Oak,
Walking alone while aiming high....
I am a girl from the Himalayas
Miles away at the shores of Jakarta.......

(Poem Written for Shipra's Elocution) Date 21st March 2016)